आजादी के बाद से अधिकांश समय तक कांग्रेस ने ही देश की सत्ता संभाली है। सबसे पुरानी और सबसे बड़ी पार्टी के नुमाइंदे आज अपनी जिम्मेदारियों से भागते नजर आ रहे है। आज भले ही अन्य राजनीतिक दल अस्तित्व में आ गए है, यह अलग बात है। उनका गठन हुए अभी समय ही कितना हुआ है, कांग्रेस की तुलना में तो उनके अभी दूध के दांत भी नहीं टूटे है। देश के किसी भी हिस्से में किसी भी स्तर का मामला हो, वहां पर कांग्रेस मुख्य पार्टी के रूप में मौजूद रहती है। आज भी लगभग हर घर का मुखिया या सबसे बड़ा सदस्य कांग्रेस के खिलाफ कुछ भी सुनना पसंद नहीं करता है, इसकी वजह साफ है उसने कांग्रेस के स्वर्णिम दिनों को देखा है, उसने देखा है कांग्रेस का जोश, कांग्रेस की ताकत और देखी है कांग्रेसजनों की वह आंधी, जिसमें उड़ गए वह अंग्र्रेज, जो सालों से राज कर रहे थे, हिन्दुस्तान पर। तब ऐसे में आज कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वह बुजुर्ग कांग्रेस से अलग होकर किसी अन्य के बारे में सोचे। वह बुजुर्ग जिसने अपना संपूर्ण जीवन कांग्रेस को समर्पित कर दिया, वह अपनी उम्र के आखिरी पड़ाव पर कैसे कांग्रेस का साथ छोड़ सकता है। समय के साथ-साथ बदलते हालात में अवसरवादिता हावी होती जा रही है। आज व्यक्तिगत हित देश हित से बड़े हो गए है। तब ऐसे में आश्चर्य तो होगा ही कि देश को अंग्रेजी दासता से मुक्त कराने के उद्देश्य से गठित कांग्रेस अपनी हर गलती की जिम्मेदारी उन दलों पर डाल कर अपने दामन को बेदाग साबित करने में जुटी है। वह ऐसा क्यों कर रही है, थोड़ा बहुत समझ में आता है, राजनीतिक पार्टी राज हासिल करने के लिए जोड़-तोड़ तो करेंगी ही, क्योंकि उसको सत्ता हासिल करनी है। यह बात बिलकुल समझ नहीं आती है कि जब कांग्रेस पूरी ईमानदारी से अपने को बेदाग साबित करते हुए हर बार सत्ता हासिल करने का प्रयास करती है तो आम जनता क्यों ईमानदारी से अपने मत का प्रयोग नहीं करती। कुछ साल पहले कांग्रेस के विकल्प के तौर पर अन्य दल नहीं थे, लेकिन अब समय बदल चुका है, राष्ट्रीय राजनीति में अन्य दल भी मौजूद है। जब हमारे सामने विकल्प मौजूद हो तब एक ही दल के प्रति निष्ठावान होना समझ से बाहर हो जाता है, वह भी उस दल के प्रति जो देशवासियों की निष्ठा के साथ खिलवाड़ कर रहा हो।
शुक्रवार, 25 मार्च 2022
गुरुवार, 24 मार्च 2022
उत्तराखंड में रंगमंच की एक आधार शिला नाट्य गुरु श्रीश डोभाल
( विश्व रंगमंच दिवस पर विशेष)
कंधे पर बैग ,बैग में २ कपडे और नाटक और रंगमंच की जीती जागती मिसाल न पैसे और न खाने की चिंता रगो में बहता रणमंच एक परिचय है श्रीश डोभाल का. कहते है अगर जीवन में समाज की बेहतरी के लिए कोई उदेश्य न हो तो वो जिंदगी निर्थक और बेजान सी हो जाती है लेकिन उदेश्य को लेकर आगे बढ़ते रहना क्या होता है और उस उदेश्य की पूर्ति के जीवन - घरबार , दो टाइम की रोटी और चमचमाता कॅरियर सब दाँव पर लगा कर कंधे पर बैग ,बैग में २ कपडे और एक शहर से दूसरे शहर की डगर भरते जीते जागते आदमी की मिसाल है नाट्य गुरु श्रीश डोभाल जिनका हाथ लगते ही या यु कहे जिनकी कार्यशाला में जाते ही देश भर के कई युवा -छात्र -पत्रकार और अध्यापक तप कर सोना बन जाते है और अपने अपने छेत्र में एक नयी पहचान बनाते है ऐसे है साहित्य की आधार शिला पर अनेक कलाओ की संविंत विधा रंगमंच के लिए समर्पित रंगकर्मी श्रीश डोभाल जिनका का जन्म ऋषिकेश में हुआ ,आरंभिक शिक्षा चम्बा [टिहरी गढ़वाल ]के बाद देहरादून से बी. एस.सी. करके सरकारी नौकरी छोड़ कर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय [ एन.एस डी ] से नाट्य व रंगमंच में तीन वर्षीय गहन स्नातकोत्तर प्रशिक्षण अभिनय विशेज्ञता के साथ 1984 में पूरा किया। ये उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा दिन था ,हर कोई NSD से निकल कर मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में अपना भाग्य आजमाने और बेहतर कैरियर के लिए जा रहा था ,ऐसे में श्रीश डोभाल ने रंगमंच के प्रति अपनी प्रतिब्धता को घ्यान में रख कर उत्तराखंड में नए रंगमंच को जन्म दिया ,उसी वर्ष [1984 ] उत्तराखंड उस समय अविभाजित उत्तरप्रदेश का अंग था यहाँ के उन प्रमुख स्थानों पर प्रशिक्षण शिविर स्थानीय कला व साहित्य प्रेमियो के सहयोग से संचालित किये और उत्तराखंड में रंगमंच को आधुनिक शैली व तकनीक से विकसित किया और क्रमश:उत्तरकाशी ,कोटद्वार ,टिहरी, गोपेश्वर और श्रीनगर में उत्साही युवाओ ,प्राथमिक से लेकर महाविद्यालयों तक के अध्यापको, छात्र-छात्राओं को सार्थक रंगमंच की ओर रुझान बढ़ाते हुए नब्बे के दशक में अनेक प्रबुद्ध व्यक्तियों को रंग आंदोलन से जोड़ कर उत्तराखंड में एक नयी विधा को जन्म दिया आज श्रीश डोभाल के जिंदगी भर के प्रयास की बदौलत उत्तराखंड के सभी जिलों में शैलनट की स्वतंत्र इकाई स्थापित की और उत्तराखंड में कला के छेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई ,शैलनट के इस नाट्य गुरु की पाठशाला से निकले और सहयोगी रहे उत्तराखंड के कुछ प्रबुद्ध नागरिक मंत्री प्रसाद नैथानी , सुरेंद्र सिंह रावत , कमला राम नौटियाल, प्रो प्रभात उप्रेती, डॉ महावीर प्रसाद गैरोला, डा सुधा आत्रे, प्रो चन्द्रप्रकाश बड़थ्वाल [पूर्व कुलपति ],सत्यप्रकाश हिंदवाण, डॉ नन्द किशोर हटवाल, प्रो डी आर पुरोहित, एसपी ममगाई, डा राकेश भट्ट, डा डीएन भट्ट, दिनेश उनियाल, अनुराग वर्मा जैसे उत्तराखंड के कई नाम है जो हर छेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे है श्रीश डोभाल ने उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को कई डाक्यूमेंट्री के जरिये सजोये रखा है साथ ही 15 भाषाओ में नाटकों का निदेशन 11 नाटकों का अनुवाद 8 विदेशी एक कन्नड़ ,हिंदी और गढ़वाली से अंग्रेजी महाभारत पर आधारित गरुड़ व्यूह का लेख न साथ ही 35 अधिक राट्रीय -अंतरास्ट्रीय निर्देशकों के साथ अभिनय ,6 निदेशित नाटकों की अंतरास्ट्रीय समारोह में सफल मंचन इसके साथ ही श्रीश डोभाल ने प्रख्यात निर्देशकों के साथ तीन राट्रीय पुरूस्कार प्राप्त फिल्मो में अभिनय किया 20 टीवी धारावाहिक कई टेली फिल्मो में अभिनय किया ,आज श्रीश डोभाल उत्तराखंड सहित कई राज्यों में नाट्य विधा के प्रसार के चलते कई पुरुस्कारो से सम्मानित है इस नाट्य गुरु का पूरा जीवन रगमंच को समर्पित है इनकी पाठशाला से निकले कई शिष्य देश भर में इस विधा को आगे ले जाने में लगे है
शनिवार, 19 मार्च 2022
वक्त और हम
वक़्त से दिन और रात, वक़्त से कल और आज
वक़्त की हर शै गुलाम, वक़्त का हर शै पे राज ।
कहते है वक्त जब मुंह मोड ले तो सब कुछ खत्म हो जाता है और जब वक्त साथ दे तो सब कुछ अपना हो जाता है. पर हम यही पर गलत हो जाते है. जो वक्त को ठीक से पहचान नहीं पाते. क्योंकि वक्त अपनी एक सी स्पीड से लगातार चलता रहता है. बस हम ही उसे पकड़ नहीं पाते. हम निराश और हताश होकर चलना बंद कर देते है और वक्त आगे निकल जाता है. अनगिनत उदाहरण है, जिन्होंने वक्त की स्पीड से आगे निकल कर उन बुलंदियों को छूकर अपने लिए वो मुकाम हासिल किया है, जो आने वाली पीढिय़ों के लिए आदर्श बन गए. हम ही अपने जीवन से हार मानकर उदास हो जाते है और कहते है कि वक्त ने हमारा साथ नहीं दिया. वक्त आएगा कहां से. उसको तो हमने ही छोड़ा है. और जिसको हमने ही छोड़ दिया, वह हमें मिलेगा कहां से. वक्त के साथ चलने के लिए हमको ही कोशिश करनी होगी. हमको ही बदलना होगा. वक्त को पकडऩे के लिए हाई स्पीड ट्रेने बनाई गई. जब उनसे भी बात नहीं बनी, तो हवा में सफर के लिए जहाजों को लाया गया. वक्त से आगे निकलना है, तो उदासी का आलम छोडऩा पड़ेगा. लगातार अपडेट रहने के साथ ही अपने लिए एक मुकाम निश्चित करके तेजी के साथ उसके लिए प्रयास करना होगा. क्योंकि वक्त ने कभी भी किसी एक का साथ नहीं दिया, वह तो सबके लिए एक सा ही होता है. बस हम ही उससे दूर और पास होते रहते है. दुनिया में कई देशों ने वक्त की नजाकत को समझते हुए विकास के वह मुकाम हासिल कर लिए है, जिनके बारे में हम ही सिर्फ सोच ही सकते है. और हम इतना पीछे छूट गए है कि वहां तक पहुंचना अभी भी नामुमकिन सा लगता है. हमारा कमजोर पहलू है कि अति उत्साह. और इसी अति उत्साह के कारण हम वक्त पर कोई भी काम करने की आदत नहीं है, और अपने पिछड़ेपन का सारा दोष वक्त पर डाल कर अपना दामन बेदाग कर लेते है.
गुरुवार, 10 फ़रवरी 2022
चुनिए उसे, जो हो साथ आपके
आर्थिक मदद और विकास की बात छोड़िए आप चुनिए उसको जिससे आप अपने जीवन संघर्ष में उम्मीडद कर सकते हैं कि वह आपके साथ होगा. यूं भी जब लड़ना खुद ही है तो फिर उसका साथ क्यों देना जो सहानुभूति तो दूर तमीज से आंख भी ना दिखा सके. चुनिए उसे जो आपके गली-मोहल्ले से होकर गुजरता हो. चुनिए उसे जिसको देखा हो आपने कंधे पर स्कूल का बैग लटकाए. देखा हो जिसको शहर की सड़कों पर आपके लिए संघर्ष करते हुए. वह जितना मजबूत होगा उतनी ही दृढ़ता के साथ आप कह सकेंगे यह तो वही है जिसका बचपन हमने देखा है. सोचिए सिर्फ आपकी एक सहमति उस नन्हे बच्चे को एक परिपक्व युवा बनाते हुए लोकतंत्र के मंदिर में आपके लिए ही कुछ कर गुजरने के लिए भेज सकती है. यह सच मानिए कि गाहे-बगाहे आप ही कहेंगे कि अरे यह तो वही है जिसको हम बचपन से जानते हैं. सोचिए जो दुख की घड़ी में आपके साथ खड़ा होता हो तो वही युवा बेघर होने के कगार पर पहुंची जनता की आवाज भी बनता हो. चुनिए उसको जो जीते या हारे रहेगा आपके आसपास ही. उसको नहीं जिससे मिलना तो दूर, दर्शन भी आसमान से तारे तोड़ने जैसा असंभव हो. दूसरों के कंधे पर चढ़कर जीत का जश्न मनाने से अच्छा है खुद के पैरों पर फुदकना. क्योंकि दूसरे के घुटनों पर आते ही आपका गिरना तय है. फैसले का वक्त आ चुका है आप अपने संघर्ष को 5 साल का एक्सटेंशन देना चाहते हैं, तो कोई दिक्कत नहीं. नहीं तो कीजिए उस युवा का समर्थन जिसकी उम्मीद केवल आपके एक फैसले पर टिकी है. याद कीजिए पिछले कई सालों में आपने क्या-क्या नहीं सहा होगा. वक्त गुजरने के साथ-साथ तो सब मैनेज हो जाता है. बात तो सिर्फ उस दुख भरे वक्त की होती है और उस पर भी जब कोई आपके जख्म पर नमक छिड़क दें. अगर परिवर्तन सृष्टि का नियम है तो फौलादी इरादों के सामने चट्टान भी धराशाई हो जाती है. फिर यह तो एक बटन दबाने की बात है. यह बटन ही तय करेगा कि आखिर आप चाहते क्या हैं? लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार तो बनेगी, लेकिन आप का विधायक आपके साथ होगा या आप से अलग. यह आपको निर्णय लेना है.
सोमवार, 27 दिसंबर 2021
पलायन और सड़क
सडक, मेरे मोहल्ले के नुक्कड से जाती है न जाने कहां तक. सडक होती है जहां, खिलखिलाती है जिंदगी वहां और तडपती-बिलखती है वहां जहां नहीं होती है सडक. सडक ही तय करती है हम कहां तक जाएगे. अमूमन जहां सडक नहीं होती वहां कोई नहीं आता- जाता. जब तक जाना- आना होता है तब तक जिंदगी दम तोड देती है. पूर्वजों की झोपडियों को गांव, गांव कस्बे और कस्बों को शहर में बदलने वाली सडक पर ही बन रही है मेट्रो सिटी. जहां सडक नहीं होती वहां से पलायन हो जाता है. जब सडक लाने वाले नेता जी भी शहर में आशियाना बना लेते हो, तब गांव में पलायन कैसे रूकेगा. न पढाने- लिखाने को मास्साब और न दवा-दारू देने डाक्टर बाबू तब गांव में पैतृक भूमि का अचार डालने लायक पैसा कमाने को शहर जाना जरूरी होता है. लेकिन सडक होती नहीं और कंधे जवाबहीन हो जाते है, नेताजी को ढोते- ढोते. नतीजन जिंदगी दम तोड देती है. पृथ्वी से आकाश की उडान में भूख से दम निकल जाता है, तब भी जो बच्चे खुशी से चिल्लाते है वो मेट्रो सिटी में नहीं गांव की पगडंडियों पर ही नजर आते है. मजेदार बात यह है कि सरकार गांव वाले ही बनाते है. शहर फास्ट लाइफ स्टाइल में वोटिंग लाइन में खडे होने वक्त ही नहीं होता है. गांवों से बनी सरकार जब मेट्रो सिटी प्लान करती है तभी से गांव से पलायन की नींव पडनी शुरू होती है. गांव को चाहिए क्या, एक सडक- मतलब एक ढंग की सडक.
सोमवार, 13 दिसंबर 2021
मौसम
गर्मी में बारिश का करता जो इंतजार.
निकलना है घर से
क्योंकि भरना है पेट
बाकी तो एसी में
ठंडा क्या गरम
एसी कहां प्रकृति
किसका मौसम
किसकी मस्ती.
पचा लेता है सब
क्योंकि ये पेट है,
कोई मौसम नहीं.
पेट तो पेट वो भी पापी.
-हरीश भट्ट
मंगलवार, 7 दिसंबर 2021
पीएम मोदी की कविता
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषण में वो आकर्षण है, जो हर किसी को मंत्रमुग्ध कर देता हैं। देहरादून के परेड ग्राउंड में पीएम मोदी के संबोधन में भी यह जादू देखने को मिला। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जहां अपने भाषण की शुरुआत गढ़वाली बोली से की, वहीं अंत कविता की कुछ पंक्तियों से किया.
जहां पवन बहे संकल्प लिए,
जहां पर्वत गर्व सिखाते हैं,
जहां ऊंचे नीचे सब रस्ते
बस भक्ति के सुर में गाते हैं
उस देवभूमि के ध्यान से ही
उस देवभूमि के ध्यान से ही
मैं सदा धन्य हो जाता हूं
है भाग्य मेरा, सौभाग्य मेरा,
मैं तुमको शीश नवाता हूं,
मैं तुमको शीश नवाता हूं
और धन्य-धन्य हो जाता हूं।
तूम आंचल हो भारत मां का,
जीवन की धूप में छांव हो तुम,
बस छूने से ही तर जाए,
सबसे पवित्र, वो धरा हो तुम
बस लिए समर्पण तन-मन से
बस लिए समर्पण तन-मन से
मैं देवभूमि में आता हूं,
मैं देवभूमि में आता हूं
हे भाग्य मेरा, सौभाग्य मेरा
मैं तुमको शीश नवाता हूं।
मैं तुमको शीश नवाता हूं।
और धन्य-धन्य हो जाता हूं
जहां अंजुली में गंगा जल हो
जहां हर एक मन बस निश्छल हो
जहां गांव-गांव में देश भक्त
जहां नारी में सच्चा बल हो
उस देवभूमि का आशीर्वाद लिए
मैं चलता जाता हूँ।
उस देवभूमि का आशीर्वाद
मैं चलता जाता हूं,
है भाग्य मेरा, सौभाग्य मेरा
मैं तुमको शीश नवाता हूं।
मंडवे की रोटी
हुड़के की थाप
हर एक मन करता
शिवजी का जाप
ऋ षि मुनियों की है
ये तपो भूमि
कितने वीरों की ये जन्मभूमि
मैं देवभूमि आता हूं
मैं तुमको शीश नवाता हूं
और धन्य धन्य हो जाता हूं
मैं तुमको शीश नवाता हूं
और धन्य धन्य हो जाता हूं।

