बुधवार, 28 अगस्त 2013

दोस्त, सहकर्मी और मैं

जहां एक ओर दोस्त मुझे अच्छा मानते है, तो वहीं दूसरी ओर सहकर्मी झगडालू. मैं नहीं जानता, मेरे व्यक्तित्व में इतना अंतर क्यों है? बात अगर दोस्तों की जाएं तो किसी से भी मन-मुटाव नहीं है. जिसकी वजह भी थोड़ी-थोड़ी समझ आ ही जाती है. मैं मानता हूं कि मतलब के लिए कभी दोस्ती नहीं करनी चाहिए. मतलब के लिए दोस्ती करने से अच्छा है कि दोस्त बनाया ही नहीं जाएं. हां, बिना मतलब की दोस्ती करने से हो सकता है कि वक्त-बेवक्त दोस्ती का धर्म निभाते हुए दोस्त मदद कर ही देते है. जिसके कारण तमाम समस्याओं से निजात मिल जाती है. फिर दोस्तों के काम ही क्या होते है, थोड़ी सी प्यार से बातें करना. हमेशा उनके साथ रहने का वादा करने में बुराई क्या है. वैसे भी सभी अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीते है. मैं उनके लिए क्या कर सकता हूं. यह अलग बात है मैंने दोस्तों की आर्थिक मदद तो शायद ही कभी की होगी, लेकिन अपना बहुमूल्य समय जरूर उनको दिया है. इसका भी कारण है कि वह लोग काम धंधे के मामले में बहुत कमजोर थे. जिससे वह कुछ कर पाने में असक्षम थे. बस मैंने अपने हुनर का प्रयोग उनकी जिंदगी संवारने में लगा दिया. करीब छह-सात दोस्तों की जिंदगी को बेरोजगारी की पटरी से रोजगार की पटरी पर ला दिया. आज वह सभी अपनी जिंदगी अपने-अपने तरीके से बेहतर ढंग से जी रहे है. दूसरी ओर मैं भी अपनी जिंदगी से खुश नहीं तो नाराज भी नहीं हूं. जिंदगी ने बहुत दिया है, जो बाकी है, उसको पाने की कोशिश जारी है. मेहनत और कोशिश की दिशा खराब नहीं हुई तो सफलता निश्चित तौर पर हासिल हो जाएगी.

अब बात आती है सहकर्मियों की. मैं मानता हूं कि वह काबिल होगे, तभी उनका सलेक्शन उस जगह नौकरी के लिए हुआ होगा, जहां-जहां मैंने काम किया है. जिनमें करीब तीन संस्थान मुख्य है. दो-तीन व्यक्तिगत तौर पर भी काम के सिलसिले में कुछ समय बिताया है. सहकर्मियों के मामले में एक बात मुझको साफ समझ आई. बॉस परिक्रमा की. माना बॉस जी-हजूरी से खुश हो जाते है. पर बॉस परिक्रमा करने वालों को यह बात कौन समझा सकता है कि बाहरी तौर पर जरूर बॉस चापलूसों से खुश नजर आते हो, पर आंतरिक दुख को उनके सिवाय और कोई नहीं समझ सकता. आखिर बॉस को भी नौकरी करनी है या अपने संस्थान को जिंदा रखना है. अब चापलूसों को बॉस परिक्रमा से फुर्सत मिले तो कुछ काम भी करें. वही दूसरी ओर ईमानदारी से काम वालों को काम करते-करते पता नहीं चलता और परिक्रमा का समय बीत चुका होता है. यह भी एक सत्य ही है कि जब-जब नौकरियों में छंटनी का दौर आया है. तब गाज चापलूसों पर ही गिरती है, लेकिन उसका खामियाजा कर्मठ लोगों को भी उठाना पड़ता है. कोई भी सोच सकता है कि अगर किसी संस्थान में सभी लोग अपना सारा समय बॉस परिक्रमा में ही गुजार देंगे, तो वहां काम क्या खाक होगा. तब नतीजतन न संस्थान का वजूद जिंदा रहेगा, न ही वहां बॉस और न ही काम करने वाले.

एक बार मैंने इन्हीं बातों से दुखी होकर अपने सीनियर से सहकर्मियों के बाबत यह सवाल पूछा कि सर आप इन लोगों को कुछ नहीं कहते और जो काम करते है उन्हीं को डांटते रहते है. इस पर उनका जवाब था कि मैं जानता हूं कि यह निक्कमे लोग है, लेकिन क्या कर सकता हूं, इनको समझने में गलती हो गई. पर तुम इतना याद रखो जब भी मंदी या छंटनी का दौर आता है, तब सबसे पहले ऐसे ही लोगों पर गाज गिरती है. फिर मैं इनको नौकरी पर रख तो सकता हूं, पर इनकी नौकरी को चला नहीं सकता. नौकरी को जिंदा रखने के लिए इनको ही मेहनत करनी होगी. बॉस के सामने अपनी योग्यता व परफेक्ट काम करने का दावा करने वालों को बॉस के पीछे बगलें झांकते हुए देख मुझे आश्चर्य होता है कि या तो हम लोग बेवकूफ है या फिर यह. कितना झूठ बोलते है. बस यही पर सहकर्मियों से मनमुटाव हो जाता है. फिर काम करते-करते मेरे पास अपनी सफाई में कहने के लिए न तो शब्द होते है और न ही समय. बाकी बचे सहकर्मी तो वह अपना काम कर ही जाते है.

एक स्कूल में कम्प्यूटर टीचर की नौकरी करते हुए मुझ पर आरोप लगने लगा कि मैं बच्चों को अच्छे से नहीं पढ़ाता हूं और बच्चे कुछ नहीं सीख पा रहे है. यह बात बहुत हास्यास्पद थी क्योंकि उसी समय नेशनल लेवल पर एक प्रतियोगिता में कम्प्यूटर एक्टिविटी में मेरे सभी स्टूडेंट्स ने सभी मेडल अपने नाम कर लिए थे. तब कोई भी जान सकता है कि अगर मैंने बच्चों को नहीं सिखाया तो आखिर किसने सिखाया. इस बात ने जरूर मेरे मन को खिन्न कर दिया था. आखिर ऐसा क्यों होता है?

यह तो मालूम है कि सच को कभी छिपाया नहीं जा सकता. पर कभी-कभी सच को सामने आने में इतना समय निकल जाता है कि तब सिर्फ पछताने के सिवाय कुछ नहीं हो सकता. समय के साथ-साथ मैंने ऐसे लोगों को संस्थान से सिर झुका कर जाते हुए भी देखा है.

यह ठीक बात है कि हर किसी की ख्वाहिश होती है, वह भी अपने संस्थान के सर्वोच्च पद तक जाएं, उसका भी नाम हो, लोग उसको भी जाने, उसकी भी हनक हो. दुनिया का दस्तूर है कि एक हाथ दे-एक हाथ ले. तब खुद ही सोचा जा सकता है कि अपने सपने को साकार करने के लिए कितना प्रयास ईमानदार से किया. आपने अपने संस्थान को जब कुछ दिया ही नहीं, तो फिर आपको कुछ कैसे मिल सकता है. हां जिन्होंने किया वह आज सर्वोच्च पदों पर पहुंच गए और जो प्रयास कर रहे है वह भी एक दिन अपनी मंजिल पर जरूर पहुंचेंगे.

दोस्तों और सहकर्मियों की बातें ही जिंदगी को प्रभावित करती है. नौकरी मिलने से पहले अधिकतर समय दोस्तों के साथ ही बितता था और नौकरी मिलने पर सहकर्मियों के साथ. बाकी बचा-कुचा समय अपने घर-परिवार के लिए. तब ऐसे में स्वयं का मूल्यांकन करने के लिए समय मिल नहीं पाता. स्वयं का आंकलन करने इस बात का अहसास जरूर हो जाएगा कि हम कितने कामयाब है या कितने नाकामयाब.

मेरा भी एक सपना था, जो 32 वर्ष की आयु पूरी करते ही टूट गया. उसको टूटना ही था, क्योंकि मैंने उसके लिए ईमानदारी से कोशिश नहीं की. जिसके पास अक्ल हो वही मंजिल तक पहुंचने के रास्तों को जानकर उन पर चल सकता है. मैं सिर्फ रास्ता ही जान पाया, पर उन रास्तों पर चलने की कोशिश भी नहीं थी. उन पर चलना एक तपस्या के समान था. चार-पांच सालों की जी-तोड़ मेहनत की बजाय इजी मोड की ओर रूख कर लिया. अब इसी इजी मोड ने जिंदगी को उस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है कि जहां से आगे चलने के लिए मेहनत और अफसोस सिवाय कुछ ओर नहीं किया जा सकता. अफसोस इस बात का जिंदगी का महत्वपूर्ण समय यूं ही गवां दिया और मेहनत इसलिए कि अभी और आगे जाना है.

शनिवार, 10 अगस्त 2013

और हम बदनाम हो गए.

हम तो यूं ही अच्छे थे.
सबसे से अलग, सबसे जुदा
अपनों की आंखों का नूर.
पर क्या करें
जमाने की हवा चली
और हम बदनाम हो गए.
बदनामी का नाम हुआ इतना
कि खुद को ही भूल गए
किस-किस से लड़े
किससे करें शिकायत.
अब तो बस यूं ही
जानता हूं मैं
नहीं मोड़ सकता आंधियों का रूख
पर इतना भी तय है कि
नहीं डिग सकता है मेरा हौसला
क्योंकि मैं हूं
सबसे बेहतर, सबसे जुदा.

सोमवार, 7 मई 2012

मां, सृष्टि की सबसे अनमोल व सर्वश्रेष्ठ कृति


मां, सृष्टि की सबसे अनमोल व सर्वश्रेष्ठ कृति. जो हर पल हैरान व सहमी होती है. कितने गणितज्ञ व शोधकर्ता आए और गए पर एक मां के जज्बात व उसके दिल में उठने वाली तरंगों को न समझ पाए. सृष्टि के निर्माता ब्रह्मा माने गए है, पर उनका दर्जा मां से ऊंचा नहीं हो सकता. वह मां जो अपने बच्चे को लेकर हर पल सहमी रहती है, बच्चा जरा खांसा तो मां की नींद हराम, जरा सा रोया तो मां बेहाल. और अपने बच्चे की हर शरारत पर मां हैरान होती है. अपने बच्चों के हावभाव के सहारे ही मां पूरी जिंदगी जी लेती है. अपने बच्चे के लिए उसके दिल में अनगिनत अरमान होते है. वह मां जो पूरी जिंदगी अपने घर परिवार व अपने पति पर ही निर्भर रहती है, अपने बच्चे को हमेशा कुछ न कुछ देने की फिराक में रहती है, ताकि बच्चे के दिल में कोई अरमान अधूरा न रह जाए. अपनी जीवन यात्रा के अंतिम पड़ाव पर सूनी आंखों देखते हुए बच्चों की खुशी या गम के आंसुओं से अपना पेट भरती है मां. तब भी वह हैरान होती है. उसने तो ऐसा नहीं सोचा था. तेजी बदलते सामाजिक मूल्यों व रिश्ते-नातों के बाजारीकरण के बीच मां अन मोल हो जाती है यानि उसका कोई मोल नहीं. हां कुछ अपवाद है, यह अलग बात है. कभी कभी सोच कर रूह कांप जाती है, कितने पत्थर दिल होते है, वो लोग जो अपने दिल से मां को बाहर निकाल फेंक देते है. सोचिए मां ने वर्षों पहले इस बात को सोचा होता, तो क्या आज वह ऐसा करने लायक भी होते है. क्योंकि उनको दुनिया में लाने का फैसला उस नारी ने लिया था, जो मां कहलाने को बेताब थी और मां बनकर उसने वह सब कुछ किया, जिसके लिए उसके दिमाग ने गवाही न दी हो, लेकिन दिल ने उसका साथ दिया था और वहीं मां लाचार बेबस निगाहों से अपने गुजरे वक्त पर जरूर रोती होगी, उसने सब कुछ लूटा दिया, क्यों? मां की भावनाओं को न तो कोई आज तक समझ पाया है और न ही कभी समझ पाएगा. हां हम सिर्फ इतना तो जरूर कर सकते है कि अगर मां को खुशियां नहीं दे सकते तो उसको दुख भी न दे.

बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

आंसुओं का सैलाब.

वो आए
मेरी जिंदगी में मुस्कराते हुए
हमने भी बिछा दी पलकें हंसते हुए
उनकी खिल-खिलाती हंसी में
लगने लगे
दिन होली और रात दीवाली
और फिर
अचानक एक दिन छोड़ गए मुझे
थम गई सांसे, छा गया अंधेरा
जो छूटा साथ, मेरे यार का
तूफान सा आ गया जिंदगी में
और
रोते-रोते आंखों से निकल पड़ा
आंसुओं का सैलाब.

गुरुवार, 24 नवंबर 2011

हजारों से बेहतर, लाखों में कमतर

कभी आप सब्जी मंडी में टमाटर खरीदने गए है. अगर नहीं गए तो मंडी जाकर टमाटर खरीद लेना बस. बात बहुत छोटी सी है, पर यही छोटी सी बात हमारी बहुत बड़ी सोच को संतुष्ट कर सकती है. अब क्योंकि हम नौकरीपेशा लोग है. हमको अपने संस्थान या मालिक वर्ग से हमेशा सिर्फ एक ही शिकायत रहती है, काम की कोई कद्र नहीं, सैलरी का कोई हिसाब नहीं. यही सोच हमारी तरक्की में सबसे बड़ी बाधक है. इस सोच को खत्म करने के लिए एक बार सब्जी मंडी में जाकर टमाटर खरीदने की जहमत उठानी पड़ेगी. सोचिए जब हम पिलपिले और पके हुए टमाटर नहीं खरीदते है, जो बहुत ही सस्ते दामों पर हमको मिल जाएगे. अब क्योंकि हम अपने खानापान से समझौता नहीं कर सकते, आगबबूले होकर अगली ठेली की ओर अपना रूख कर लेते है. तब आज के बेहद कठिन प्रतिस्पर्धी माहौल में हम कैसे दावा कर सकते है कि हम सबसे बेहतर है. और हमारे नियोक्ता हमको मुंहमांगा वेतन उपलब्ध कराए. कभी हम हजारों में बेहतर थे, आज लाखों हमसे बेहतर है. हर पल हर दिन नई टेक्नोलॉजी और कार्य की संस्कृति बदल रही है, ऐसे में स्वयं को परिवर्तन के अनुरूप ढालना जरूरी हो जाता है. मैंने कभी पढ़ा था कि सबसे बड़ा देशभक्त वह है, जो किसी को रोजगार उपलब्ध कराए. ऐसे में अपने नियोक्ता की नियत पर शक करने का सवाल ही पैदा नहीं होता. क्योंकि उसने ही हमको रोजगार उपलब्ध कराया है. यह हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम अपना बेहतर प्रदर्शन करते हुए अपने संस्थान को तरक्की के रास्ते पर ले जाए. अगर हम ऐसा कर पाने में सफल हो जाते है, तो हमको अपने साथ रखना और मुंहमांगा वेतन उपलब्ध कराना संस्थान या मालिक वर्ग की मजबूरी बन जाएगा, ठीक वैसे ही जैसे बहुत अच्छे टमाटर देख हमारे मुंह में पानी आ जाता है और हम महंगे दामों पर भी उनको खरीदने को तैयार रहते है.

गुरुवार, 27 अक्टूबर 2011

स्थायित्व प्रदान करती है कर्म पूजा

काल करे सो आज, आज करे सो अब।
पल में प्रलय होएगी, बहुरि करोगे कब।।
वर्तमान में मीडिया क्षेत्र में इस दोहे को चरित्रार्थ होता देखा जा सकता है। जहां पर आज तो आज की नीति पर अमल होता है। हां, प्रलय जैसी बात तो नहीं होगी, लेकिन स्पर्धा के दौर में दूसरे के आगे निकल जाने का डर हमेशा मन में समाया रहता है। मीडिया क्षेत्र की सबसे बड़ी और अच्छी बात यह है कि यहां पर किसी भी काम को अगले दिन पर नहीं छोड़ा जा सकता है। मतलब काम कितना भी हो, आज ही खत्म होना है। कभी-कभी झुंझलाहट भी बहुत होती है। यह कैसी नौकरी है, जहां पर एक दिन की छुट्टी भी आराम से नहीं मिलती। बहुत से लोगों को यह कहते सुना जा सकता है, अरे तुम छुट्टी की बात करते हो, मुझे अपनी शादी के समय सिर्फ दो या तीन का अवकाश बामुश्किल मिला था। उस समय मन करता है अभी इस नौकरी को छोड़ कर दूसरी नौकरी के लिए बात की जाए। लेकिन जैसे ही दिन का काम खत्म होता है या अवकाश मंजूर हो जाता है, वैसे ही झुंझलाहट भी दूर हो जाती है। यह जो झुंझलाहट है, ईमानदार व कर्मठ व्यक्ति के स्वभाव में नहीं है, पर क्या किया जा सकता है, यह आती उन लापरवाह व्यक्तियों की ओर से, जिनको शौक होता है, मीडिया में जॉब करने का, लापरवाह व अयोग्य व्यक्ति जोड़-तोड व सिफारिश के बल पर मीडिया में जॉब हासिल कर लेते है। लेकिन काम न करने की आदत के चलते न तो खुद ही काम करते है और न ही दूसरों को करने देते है। इन लोगों के पास इतना समय होता है कि देखकर ताज्जुब होता है। रही बात काम करने की, तो काम तो आता ही नहीं करे भी कैसे। बॉस परिक्रमा करने की आदत के चलते उनको कुछ कहा भी नहीं जा सकता। उनकी यह आदत जब रूटीन काम में दखल डालती है, तो सारा काम ही रूका जाता है, तब झुंझलाहट स्वयं आती है दिमाग खराब करने। लगभग हर ऑफिस में दिखने वाले इन लापरवाह सहयोगियों के कारण काम पर कितना असर पडे़गा, कोई भी आसानी से समझ सकता। बॉस भी ऐसे की, आवाज मार कर बुला लेते है उनको अपने पास और जमा लेते है महफिल। इसकी वजह भी साफ समझ में आती है कि राजाओं को चंगू-मंगू रखने का शौक होता है, जो उनकी हर बात में हां मिलाते रहे। बॉस इज आलवेज राइट। पर जरूरी नहीं बॉस हमेशा सही हो, बॉस गलत भी हो सकते है, वह कोई भगवान तो है नहीं, आखिर वह भी इंसान ही है, गलती हो सकती है, उनको समझाया जा सकता है। अब क्योंकि मीडिया में समय कम होता है, काम ज्यादा। तब ऐसे में काम करने वाले काम में ही उलझे रहते है। बॉस को समझाने का समय तक भी नहीं मिल पाता, जब समय मिलता है, तब तक चिड़िया चुग गई खेत, अब पछताए क्या होत वाली कहावत हकीकत में बदल जाती है। फिर शुरू होता है आरोप-प्रत्यारोप का दौर, जो आजकल कम्प्यूटर टू कम्प्यूटर वाया इंटरनेट पर चलता है। साथ ही सबसे ज्यादा नफरत उन सहयोगियों से होती है, जो खुद तो कभी कुछ करते नहीं, उल्टे काम करने वालों के साथ कंपनी और बॉस की बुराई करते-फिरते रहते है। अरे भाई हमारी तो कोई कद्र ही नहीं, काम करते, रहो, तनख्वाह का नाम न लो। मेरी समझ में नहीं आता । जब काम की योग्यता नहीं होती, तो क्यों मीडिया में घुसे चले आते है। क्यों अपना समय खराब करते है, कहीं पर भी पान की दुकान खोली जा सकती है, जिसके दो फायदे होगे, एक तो पैसा आता रहेगा, दूसरे लोग आपके चक्कर लगाने लगेंगे। सोचिए कितना अच्छा होगा, जहां अभी तक आप बॉस परिक्रमा करते थे, वही लोग आपकी परिक्रमा करने लगेंगे। फिर किसी डाक्टर ने तो कहा नहीं कि बगैर तनख्वाह के मीडिया में जबरदस्ती घुसे रहो। एक बात अच्छी तरह समझ आ गई कि काम की हमेशा कद्र होती है। जब तक जिस कंपनी में रहो, ईमानदारी से काम करो। भले ही व्यक्ति पूजा आपको काम दिलवाने में मददगार साबित हो जाए, लेकिन कर्म-पूजा आपको स्थायित्व प्रदान करती है। साथ ही कंपनी को हमेशा काम करने वालों की जरूरत रहती है। क्योंकि जब करने वाले ही नहीं होगे तो कंपनी कैसे चलेगी। भले ही देर से सही ईमानदार व कर्मठ कर्मचारियों की कद्र होती है। अब मीडिया क्षेत्र में जितना समय है उतने समय में एक ही काम को महत्व दिया जा सकता है व्यक्ति पूजा या कर्म पूजा। अब यह हमारे पर निर्भर करता है आखिर किसको महत्व देना है। व्यक्ति पूजा के चलते प्रलय तो नहीं आती है, दिमाग जरूर हिल जाता है, जब अगले दिन रिजल्ट खराब आता है। इन लापरवाह लोगों की वजह से कबीर दास जी
का यह दोहा पूरी तरह बदल गया है-
अब करे सो आज, आज करे सो काल। पल में प्रलय होएगी, मौज करेगा कब।।

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011

प्लीज अन्ना, भ्रमित न करें

‘अन्ना’ आज किसी पहचान के मोहताज नहीं है. भ्रष्टाचार के खिलाफ जनलोकपाल
बिल लाने की दिशा में अन्ना ने जिस आंदोलन की शुरूआत की थी. वह आज
सार्वजनिक हितों से दूर व्यक्तिगत हितों की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है.
अन्ना की राजनीतिक महत्वाकांक्षा उभर कर सामने आ रही है. यह ठीक बात है
कि देश में बढ़ते भ्रष्टाचार के लिए कांग्रेस जिम्मेदार है. हो भी क्यों
न आजादी के बाद से आज तक अधिकतर समय सत्ता कांग्रेस के हाथ में ही थी.
इसलिए सभी अच्छीबुरी बातों के लिए कांग्रेस की ही जिम्मेदारी बनती है.
अगर कांग्रेस ने देश के विकास में अग्रणी भूमिका निभाई तो देश पर क्या
अहसान किया, देशवासियों ने कांग्रेस पर भरोसा किया तभी वह लगभग अधिकतर
समय तक सत्ता में रहे. यहां पर भाजपा व अन्य दलों की जिम्मेदारी थोड़ी कम
बनती है. क्योंकि वह बहुत कम समय तक सत्ता में रहे. इसलिए कांग्रेस की
अपेक्षा भाजपा व अन्य पार्टियां भ्रष्टाचार बढ़ाने के लिए कम दोषी मानी
जा सकती हैं. लेकिन इस बात से भाजपा व अन्य पार्टियों को निर्दोष नहीं
ठहराया जा सकता. गैर कांग्रेसी पार्टियां अगर सत्ता में नहीं थी, तो क्या
वह मुख्य विपक्षी पार्टी तो थी. उन्होंने कांग्रेस के गलत कामों को रोकने
का प्रयास ईमानदारी से क्यों नहीं किया? क्यों आज तक देशवासियों का भरोसा
नहीं जीत सकी? राजनीति के दांवपेंच से अजीज आ चुके देशवासियों ने अन्ना
की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में खुद को शामिल कर लिया. लेकिन आज देशवासी
खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं. इसकी वजह साफ नजर आती है कि अन्ना व
उनकी टीम आखिर चाहती क्या हैं? जनलोकपाल बिल पास न करने के लिए अगर
कांग्रेस को दोषी ठहराया जा रहा है तो भाजपा व अन्य पार्टियों को भी तो
दोषी ठहराया जाना चाहिए. देशवासियों के समर्थन से गदगद अन्ना व उनकी टीम
चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ माहौल तैयार कर रही है. उनका कहना है कि
जनलोकपाल बिल की बात न करने वालों को चुनाव में हराना है. सबसे बड़ा सवाल
यहां पर यह उठता है कि अगर सभी को चुनाव में हराना है तो जिताना किसको
है. (अन्ना व उनकी टीम को, जो चुनाव ही नहीं लड़ रही है.) अन्ना अगर
राजनीतिक पार्टियों को हराने की बात कह रहे हैं तो इसका विकल्प क्यों
नहीं बताते, फलां पार्टी के व्यक्ति को चुनाव जिताना है. वैसे भी अपना
देश इतना बड़ा है कि एक कोने के विचार दूसरे कोने विचारों से मेल नहीं
खाते. तब ऐसे में निर्दलीय प्रत्याशियों के जीत कर आने की संभावना बढ़
जाएगी. फिर सरकार का क्या होगा, कौन बनेगा प्रधानमंत्री और कौन करेगा बिल
पास. हमारी संवैधानिक व्यवस्था है कि संसद में बहुमत वाली पार्टी ही
सरकार बनाएगी. आखिर अन्ना अपना रूख साफ क्यों नहीं करते कि वह किंग बनना
चाहते हैं या किंगमेकर. अगर किंगमेकर बनने की तमन्ना है तो उनका किंग कौन
होगा. अगर वह ऐसा नहीं कर पा रहे हैं तो क्यों देशवासियों को भ्रमित कर
रहे हैं. यह हमारी मजबूरी है कि हर पांच साल में हमको अपनी सरकार के लिए
नेताओं का चुनाव करना होता है. हम मतदान में भाग लें या न लें, इस बात से
कोई फर्क नहीं पड़ता है. क्योंकि हम अपना मत नहीं देंगे तब भी हमारा नेता
चुना जाना तय है. उसके बाद सरकार भी बनेगी. यह कटु सत्य है. इसलिए यह
बहुत जरूरी हो जाता है कि अन्ना व उनकी टीम इस मुद्दे पर अपना रूख साफ
करे.